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उपनिषद में कर्म का सिद्धांत क्या है?

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बृहदारण्यक (4/4/5) — 'जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।' छान्दोग्य (5/10/7) में देवयान और पितृयान — दो कर्म-मार्ग बताए गए हैं। ईशावास्योपनिषद (1-2) में निर्लेप कर्म का संदेश है। ब्रह्मज्ञान से सभी कर्म-बंधन नष्ट होते हैं।

  1. 1जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है — वैसा ही बनता है। शुभ कर्म से शुभ, पाप कर्म से पापी। यही पुनर्जन्म का आधार है।
  2. 2देवयान — ज्ञान और तपस्या वाले ब्रह्म-लोक को जाते हैं — लौटते नहीं (मोक्ष)
  3. 3पितृयान — शुभ कर्म करने वाले चंद्र-लोक जाते हैं, फिर वापस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं
  4. 4सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। इसीलिए निर्लेप होकर कर्म करो। *'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।'* — कर्म करते हुए जियो — कर्म ही मनुष्य का धर्म है।
  5. 5संचित कर्म — सभी पूर्व जन्मों के कर्मों का संग्रह
  6. 6प्रारब्ध कर्म — इस जन्म में फल दे रहे कर्म
  7. 7आगामी कर्म — वर्तमान में किए जाने वाले कर्म
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