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शास्त्र ज्ञान📜 बृहदारण्यक उपनिषद 4/4/5, छान्दोग्य उपनिषद 5/10/7, कठोपनिषद 2/18, ईशावास्योपनिषद 1-2, मुण्डकोपनिषद 2/2/92 मिनट पठन

उपनिषद में कर्म का सिद्धांत क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

बृहदारण्यक (4/4/5) — 'जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।' छान्दोग्य (5/10/7) में देवयान और पितृयान — दो कर्म-मार्ग बताए गए हैं। ईशावास्योपनिषद (1-2) में निर्लेप कर्म का संदेश है। ब्रह्मज्ञान से सभी कर्म-बंधन नष्ट होते हैं।

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विस्तृत उत्तर

## उपनिषद में कर्म का सिद्धांत

उपनिषदों में कर्म की अवधारणा

उपनिषदों में कर्म-सिद्धांत पुनर्जन्म, कर्मफल और मोक्ष — तीनों से जुड़ा है। कर्म के बंधन से मुक्ति ही मोक्ष है।

बृहदारण्यक उपनिषद (4/4/5) — कर्म और जन्म

*'तद्यथाकारी तद्यथाचारी तद्भवति।

साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति।'*

— जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है — वैसा ही बनता है। शुभ कर्म से शुभ, पाप कर्म से पापी। यही पुनर्जन्म का आधार है।

छान्दोग्य उपनिषद (5/10/7) — दो मार्ग

  • देवयान — ज्ञान और तपस्या वाले ब्रह्म-लोक को जाते हैं — लौटते नहीं (मोक्ष)
  • पितृयान — शुभ कर्म करने वाले चंद्र-लोक जाते हैं, फिर वापस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं

ईशावास्योपनिषद (1-2) — कर्म और मोक्ष का समन्वय

*'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।'*

— सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। इसीलिए निर्लेप होकर कर्म करो। *'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।'* — कर्म करते हुए जियो — कर्म ही मनुष्य का धर्म है।

कर्म और ज्ञान का संबंध

मुण्डकोपनिषद (2/2/9) — जब ब्रह्मज्ञान हो जाता है, तब सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। ज्ञान कर्म के बंधन को काट देता है।

उपनिषदों में कर्म के प्रकार

  • संचित कर्म — सभी पूर्व जन्मों के कर्मों का संग्रह
  • प्रारब्ध कर्म — इस जन्म में फल दे रहे कर्म
  • आगामी कर्म — वर्तमान में किए जाने वाले कर्म

ज्ञान का प्रभाव: ब्रह्मज्ञान से संचित और आगामी कर्म नष्ट होते हैं — केवल प्रारब्ध भोगना पड़ता है।

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शास्त्रीय स्रोत
बृहदारण्यक उपनिषद 4/4/5, छान्दोग्य उपनिषद 5/10/7, कठोपनिषद 2/18, ईशावास्योपनिषद 1-2, मुण्डकोपनिषद 2/2/9
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