विस्तृत उत्तर
## उपनिषद में कर्म का सिद्धांत
उपनिषदों में कर्म की अवधारणा
उपनिषदों में कर्म-सिद्धांत पुनर्जन्म, कर्मफल और मोक्ष — तीनों से जुड़ा है। कर्म के बंधन से मुक्ति ही मोक्ष है।
बृहदारण्यक उपनिषद (4/4/5) — कर्म और जन्म
*'तद्यथाकारी तद्यथाचारी तद्भवति।
साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति।'*
— जैसा कर्म करता है, जैसा आचरण करता है — वैसा ही बनता है। शुभ कर्म से शुभ, पाप कर्म से पापी। यही पुनर्जन्म का आधार है।
छान्दोग्य उपनिषद (5/10/7) — दो मार्ग
- ▸देवयान — ज्ञान और तपस्या वाले ब्रह्म-लोक को जाते हैं — लौटते नहीं (मोक्ष)
- ▸पितृयान — शुभ कर्म करने वाले चंद्र-लोक जाते हैं, फिर वापस पृथ्वी पर जन्म लेते हैं
ईशावास्योपनिषद (1-2) — कर्म और मोक्ष का समन्वय
*'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।'*
— सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। इसीलिए निर्लेप होकर कर्म करो। *'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।'* — कर्म करते हुए जियो — कर्म ही मनुष्य का धर्म है।
कर्म और ज्ञान का संबंध
मुण्डकोपनिषद (2/2/9) — जब ब्रह्मज्ञान हो जाता है, तब सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। ज्ञान कर्म के बंधन को काट देता है।
उपनिषदों में कर्म के प्रकार
- ▸संचित कर्म — सभी पूर्व जन्मों के कर्मों का संग्रह
- ▸प्रारब्ध कर्म — इस जन्म में फल दे रहे कर्म
- ▸आगामी कर्म — वर्तमान में किए जाने वाले कर्म
ज्ञान का प्रभाव: ब्रह्मज्ञान से संचित और आगामी कर्म नष्ट होते हैं — केवल प्रारब्ध भोगना पड़ता है।





