वैदिक काल में संध्या वंदन कैसे की जाती थी?
की चेकलिस्ट
वैदिक संध्या: त्रिसंध्या (अनिवार्य), नदी स्नान, गायत्री 1008 (स्वर-कठोर), सूर्य उपस्थान (खड़े), अग्निहोत्र (दूध/घी — अग्नि सदा प्रज्वलित), मार्जन, प्राणायाम, अघमर्षण। आज सरलीकृत — मूल तत्व (स्नान+गायत्री+अर्घ्य) वही।
- 1तीन संध्या (अनिवार्य): प्रातः (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर), सायं (सूर्यास्त) — तीनों अनिवार्य। छोड़ना = पतन।
- 2नदी/सरोवर स्नान: प्रत्येक संध्या से पूर्व शीतल जल (नदी) में स्नान = शारीरिक + आत्मिक शुद्धि।
- 3गायत्री जप: गायत्री मंत्र = संध्या का मूल। स्वर-शुद्ध उच्चारण (उदात्त-अनुदात्त-स्वरित) अत्यंत कठोर। 1008 बार जप = सामान्य।
- 4सूर्य उपस्थान: खड़े होकर सूर्य की ओर मुख करके उपस्थान (स्तुति) मंत्र — 'उद्वयं तमसस्परि...' (ऋग्वेद)।
- 5अग्निहोत्र: प्रातः-सायं = गृहस्थ अग्निहोत्र (अग्नि में दूध/घी आहुति) संध्या का अभिन्न अंग। गृहस्थ की अग्नि कभी न बुझती।
- 6मार्जन (जल शुद्धि): 'आपो हि ष्ठा मयोभुवः...' (ऋग्वेद) मंत्र से जल छिड़ककर शुद्धि।
- 7प्राणायाम: गायत्री सहित प्राणायाम (ॐ भूः, ॐ भुवः, ॐ स्वः + गायत्री + 7 व्याहृतियाँ)।
- 8अघमर्षण (पाप क्षय): 'ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्...' मंत्र से जल में डुबकी/जल छिड़काव = पापों का मार्जन।
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वैदिक कर्मकांड
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