दो सन्दर्भ: (1) ऋत्विज्: ब्रह्मा = यज्ञ अध्यक्ष (अथर्ववेद), होता = आह्वान (ऋग्वेद), अध्वर्यु = कर्म (यजुर्वेद), उद्गाता = गान (सामवेद)। (2) त्रिमूर्ति: ब्रह्मा = यज्ञ विधान रचना, विष्णु = 'यज्ञो वै विष्णुः' (शतपथ) — यज्ञ स्वरूप/फलदाता, शिव = अग्नि रूप शुद्धिकर्ता।
- 1होता (ऋग्वेद): देवताओं का आह्वान और स्तुति।
- 2अध्वर्यु (यजुर्वेद): यज्ञ क्रियाओं का व्यावहारिक सम्पादन — हवि तैयार करना, अग्नि में आहुति देना।
- 3उद्गाता (सामवेद): सामगान — संगीतात्मक मंत्र गायन।
- 4ब्रह्मा (अथर्ववेद): यज्ञ का अध्यक्ष — सम्पूर्ण निरीक्षण, त्रुटि सुधार।
- 5ब्रह्मा (सृष्टि): यज्ञ की योजना, रचना और विधान। ब्रह्मा ने सृष्टि के साथ यज्ञ का विधान रचा — 'सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा' (गीता 3.10)।
- 6विष्णु (स्थिति/पालन): विष्णु स्वयं यज्ञ स्वरूप हैं — 'यज्ञो वै विष्णुः' (शतपथ ब्राह्मण)। विष्णु यज्ञ के फल देने वाले और यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं। भगवद्गीता (3.14-15) में यज्ञ चक्र का वर्णन है।
- 7महेश्वर/शिव (संहार/शुद्धि): शिव यज्ञ में अग्नि के रूप में प्रतीकात्मक हैं — अग्नि जो अशुद्धियों को जलाकर शुद्ध करती है। दक्ष यज्ञ की कथा में शिव का यज्ञ से गहन सम्बन्ध दर्शाया गया है।