शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
भैरव मंत्र
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्। सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
प्रकारश्रुतिफल मंत्र
स्वरूपफलदायिनी श्री
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
जो मनुष्य पवित्र होकर घी से आहुति देता है और श्री की कामना से इन पंद्रह ऋचाओं का जप करता है, वह समृद्ध होता है।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
अनुष्ठान की पूर्णता
विस्तृत लाभ
अनुष्ठान की पूर्णता।
जप काल
साधना के अंत में।
इसे भी पढ़ें
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
शङ्खेषु चाप कुसुमेषु कुठार पाश चक्राङ्कुशौ कलममञ्जरिका गदाद्यौ । पाणिस्थितैः परिसमाहित भूषणः श्री विघ्नेश्वरो विजयते तपनीयगौरः ॥
नमो भगवते फट् भैरवाय... आकर्षय-2 आवेशय-2 मोहय-2 भ्रामय-2... ह्रां ह्रीं त्रिपुरतांडवाय अष्टभैरवाय भाषय-2 स्वाहा।
ॐ शतकान्ठमदापहर्त्रे नमः
ॐ कुमार कुशलो दयायै नमः
ॐ यो वै रामचन्द्रः स भगवान् ये जनकनन्दिनी तस्मै वै नमो नमः भूर्भुवः स्वः
ॐ क्षीराब्धिशयनाय नमः