देवी सूक्त मंत्र - 2
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्। अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
मैं ही शत्रुनाशक सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। जो यजमान देवताओं को हवि अर्पित करता है, उसे मैं ही धन-धान्य प्रदान करती हूँ 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
धन, समृद्धि और यज्ञ (सत्कर्म) के उत्तम फलों की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
धन, समृद्धि और यज्ञ (सत्कर्म) के उत्तम फलों की प्राप्ति 1।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ ब्रह्मवन्दिताय नमः
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु। (अर्थ: कवियों की जिह्वा में बसने वाली देवी पश्चिम में रक्षा करें) 8
ॐ यो वै रामचन्द्रः स भगवान् ये पञ्चमहाभूतानि तस्मै वै नमो नमः भूर्भुवः स्वः
ॐ कूर्चजपपरायणायै नमः
इडा देवहूर्मनुर्यज्ञनीर्बृहस्पतिरुक्थामदानि शंसिषद् विश्वेदेवाः सूक्तवाचः पृथिविमातर्मा मा हिंसीर्मधु मनिष्ये मधु जनिष्ये मधु वक्ष्यामि मधु वदिष्यामि मधुमतीं देवेभ्यो वाचमुद्यासँशुश्रूषेण्यां मनुष्येभ्यस्तं मा देवा अवन्तु शोभायै पितरोऽनुमदन्तु॥
राजमातां राजलक्ष्मीं राजेष्टफलदायिनीम्। प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीजयप्रदां॥