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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

देवी सूक्त मंत्र - 2

अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्। अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारवैदिक मंत्र |
स्वरूपवाक् देवी
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

मैं ही शत्रुनाशक सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। जो यजमान देवताओं को हवि अर्पित करता है, उसे मैं ही धन-धान्य प्रदान करती हूँ 1।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

धन, समृद्धि और यज्ञ (सत्कर्म) के उत्तम फलों की प्राप्ति

विस्तृत लाभ

धन, समृद्धि और यज्ञ (सत्कर्म) के उत्तम फलों की प्राप्ति 1।

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