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शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

विवेक एवं उचित निर्णय क्षमता मंत्र

आवत हियँ हरषीं नहिं नैनन्हि नहिं सनेह। तुलसी तहाँ न जाइये कंचन बरसे मेह॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारलौकिक व्यवहार / विवेक-जागृति संपुट
स्वरूपज्ञानी हनुमान
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

जिसके हृदय में आपके आने से हर्ष न हो और आँखों में प्रेम न हो, तुलसीदास जी कहते हैं कि वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए, भले ही वहाँ सोने की वर्षा क्यों न हो रही हो।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

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यह मंत्र (चौपाई) जीवन में उचित-अनुचित का भेद करने, कुसंगति से बचने और कार्यस्थल (Workplace) पर सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है

विस्तृत लाभ

यह मंत्र (चौपाई) जीवन में उचित-अनुचित का भेद करने, कुसंगति से बचने और कार्यस्थल (Workplace) पर सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है 38।

जप काल

जब भी निर्णय लेने में भ्रम हो, तब इसका मनन करें।

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