शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥
करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् । वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारबाल-मुकुन्द ध्यान / ध्यान मन्त्र / स्तुति
स्वरूपप्रलयकालीन बाल-मुकुन्द (वट-पत्र-शायी)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
जो अपने कर-कमलों (हाथों) से चरण-कमलों को पकड़कर अपने मुख-कमल में डाल रहे हैं, और प्रलय-काल में वट-वृक्ष के पत्ते पर शयन कर रहे हैं, उन बाल-मुकुन्द का मैं मन से स्मरण करता हूँ 35।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
वात्सल्य भाव की जाग्रति, चित्त की अगाध शान्ति और जीवन के बड़े से बड़े भयों से मुक्ति
विस्तृत लाभ
वात्सल्य भाव की जाग्रति, चित्त की अगाध शान्ति और जीवन के बड़े से बड़े भयों से मुक्ति 35।
जप काल
शयन से पूर्व या बाल-कृष्ण (लड्डू गोपाल) की पूजा के समय 20।
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