ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
शास्त्रीय पौराणिक मंत्र

परशुराम अष्टकम् (श्लोक 3)

भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम्। गतगर्वप्रियं शूरं जमदग्निसुतुं मतम्॥

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारस्तोत्र-मंत्र
स्वरूपधर्म-रक्षक
अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ

जो भयभीत स्वजनों (भक्तों) की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, जो पूर्णतः धर्मपरायण हैं, जिन्हें अंहकार-रहित (गतगर्व) लोग प्रिय हैं, उन शूरवीर जमदग्नि-पुत्र को मैं अपना सर्वस्व मानता हूँ।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

संकट काल में अपनों की सुरक्षा एवं धर्म में अटूट निष्ठा की प्राप्ति

विस्तृत लाभ

संकट काल में अपनों की सुरक्षा एवं धर्म में अटूट निष्ठा की प्राप्ति।

जप काल

जब भी परिवार पर कोई संकट हो, रक्षा-कामना हेतु।

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