श्रीहरिः पातु ते वक्त्रं मस्तकं मधुसूदनः । श्रीकृष्णश्चक्षुषी पातु नासिकां राधिकापतिः ॥
श्रीहरिः पातु ते वक्त्रं मस्तकं मधुसूदनः । श्रीकृष्णश्चक्षुषी पातु नासिकां राधिकापतिः ॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
श्री हरि तुम्हारे मुख की, मधुसूदन मस्तक की, श्रीकृष्ण नेत्रों की और राधिकापति नासिका की रक्षा करें 19।
इस मंत्र से क्या होगा?
मुख, मस्तक, नेत्र और नासिका की सभी भौतिक एवं अदृश्य शक्तियों से रक्षा
यह कवच भय और चिन्ता को दूर करता है
विस्तृत लाभ
मुख, मस्तक, नेत्र और नासिका की सभी भौतिक एवं अदृश्य शक्तियों से रक्षा। यह कवच भय और चिन्ता को दूर करता है 19।
जप काल
यात्रा से पूर्व या संकट के समय, शरीर के अंगों का स्पर्श (न्यास) करते हुए इसका पाठ किया जाता है 19।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
ॐ नृं नृं नृं नरसिंहाय नमः
ॐ पूतात्मने नमः
ॐ अवलम्बायै नमः
ॐ हुं हुं शत्रुस्तम्भनाय हुं हुं ॐ फट्
ॐ श्रीं ह्रीं ह्स्सौः हूँ फट् नील सरस्वत्यै स्वाहा।
श्रीमत्तीक्ष्ण शिखाङ्कुशाक्षवरदान् दक्षे दधानः करैः पञ्चामृतपूर्णकुम्भमभयं वामे दधानो मुदा । पीठ स्वर्णमयारविन्दविलसत् सत्कर्णिका भासुरे आसीनस्त्रिमुखः पलाशरुचिरो नागाननः पातु नः ॥