सर्व-व्यापकता मंत्र
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ॥ सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥ सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥ त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥ त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
यह संपूर्ण जगत आपसे उत्पन्न होता है, आपमें ही स्थित है, और अंततः आपमें ही विलीन हो जाएगा। आप ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। आप ही वाणी के चार रूप हैं।
इस मंत्र से क्या होगा?
प्रकृति के पंचतत्त्वों और ईश्वर के मध्य सामंजस्य की अनुभूति
विस्तृत लाभ
प्रकृति के पंचतत्त्वों और ईश्वर के मध्य सामंजस्य की अनुभूति।
जप काल
योग साधना और पंचतत्त्व ध्यान के दौरान।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
कैलासशिखरे रम्ये शंकरं लोकशंकरम्। पार्वत्युवाच- त्वत्तः श्रुतान्यशेषाणि जामदग्न्यस्य साम्प्रतम्॥
ॐ लङ्कापुरविदाहकाय नमः
ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धं मे श्रीं सदाऽवतु। (स्वरूप: श्रीं ह्रीं स्वरूपा | लाभ: गर्दन और कंधों की रक्षा | अर्थ: देवी मेरी ग्रीवा और स्कंध की रक्षा करें) 8
ॐ सर्वैश्वर्यप्रदायिन्यै नमः
ॐ कामरूपिण्यै नमः
ॐ भूवराहाय विद्महे हिरण्याक्षहराय धीमहि तन्नो वराहः प्रचोदयात्।