व्यक्ताव्यक्तगिरः (सौः बीज मन्त्र)
व्यक्ताव्यक्तगिरः सर्वे वेदाद्या व्याहरन्ति याम्। सर्वकामदुघा धेनुः सा मां पातु सरस्वती॥ सौः देवीं वाचमजनयन्त देवास्ता विश्वरूपाः पशवो वदन्ति। सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु॥
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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इस मंत्र का अर्थ
वेद आदि समस्त ग्रंथ व्यक्त और अव्यक्त रूप से जिनका गान करते हैं, वे सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाली कामधेनु रूपी सरस्वती मेरी रक्षा करें। देवताओं ने जिस वाग्देवी को उत्पन्न किया, वह आनंदमयी, अन्न और ऊर्जा देने वाली वाग्देवी हमारी स्तुति से प्रसन्न होकर हमारे पास आयें।
इस मंत्र से क्या होगा?
समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति, स्पष्ट और गूढ़ दोनों प्रकार की वाणी की सिद्धि
विस्तृत लाभ
समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति, स्पष्ट और गूढ़ दोनों प्रकार की वाणी की सिद्धि।
जप काल
वाक्-सिद्धि साधना के समय।
अन्य देवताओं के मंत्र
प्रत्येक देवता का एक चुनिंदा मंत्र
लम्बोदरं श्यामं तनुं गणेशं कुठारमक्षस्रजं ऊर्ध्वगाभ्याम् । सालद्रुङ्गं दन्तमधः कराभ्यां वामेतराभ्यां च दधानमीडे ॥
ॐ रुद्राय रोगनाशाय आगच्छ च राम् ॐ नमः
जो शांत भाव से सह्याद्रि (और महेंद्र) पर्वत पर निवास करते हैं, उन्हें नमस्कार। (लाभ: जीवन में स्थिरता और भूमि-लाभ) 19।
तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः । तिग्मजम्भस्य मीळ्हुषः ॥
ॐ साधकप्रचुरानन्दसम्पत्सुखदायै नमः