जयदुर्गा मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ जयदुर्गा मंत्र विनियोग न्यास ध्यान और जप विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ जयदुर्गा
दुर्गा साधनानौ दुर्गा मंत्रजयदुर्गा मंत्ररुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में '११. शान्तिदुर्गादि नौ दुर्गाओं के मन्त्र-विधान' के अंतर्गत '८. जयदुर्गा' में जयदुर्गा मन्त्र का विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादिन्यास, ध्यान और मूलमन्त्र दिया गया है।
मूल मंत्र
८. जयदुर्गा विनियोग अस्य श्रीजयदुर्गामन्त्रस्य दुर्वासा ऋषिः ककुप् छन्दः जयदुर्गा देवता दुं बीजं श्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे मन्त्रजपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास दुर्वाससे ऋषये नमः (शिरसि) । ककुप् छन्दसे नमः (मुखे) । जयदुर्गादेवतायै नमः (हृदये) । दुं बीजाय नमः (गुह्ये) । श्रीं शक्तये नमः (पादयोः) । क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ) । विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) । कर-हृदयादिन्यास "दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" (इस मन्त्र से करें) ध्यान कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां, शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्, सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं, ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धसंघैः ॥ मूलमन्त्र "दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" ।
बीज मंत्र
दुंश्रींक्लीं
साधना विधि
स्रोत के अनुसार जयदुर्गा मन्त्रजप के लिए पहले विनियोग करना है। फिर ऋष्यादिन्यास और कर-हृदयादिन्यास करके ध्यान के बाद मूलमन्त्र का जप बताया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- जयदुर्गा मन्त्रजप
- श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थ विनियोग
- ऋष्यादिन्यास
- कर-हृदयादिन्यास
- ध्यान और मूलमन्त्र जप
लाभ
- श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्धि
- जयदुर्गा मन्त्रजप
- ऋष्यादिन्यास
- कर-हृदयादिन्यास
- ध्यान
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
८. जयदुर्गा--अस्य श्रीजयदुर्गामन्त्रस्य दुर्वासा ऋषिः ककुप् छन्दः जयदुर्गा देवता दुं बीजं श्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे मन्त्रजपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास--दुर्वाससे ऋषये नमः (शिरसि) । ककुप् छन्दसे नमः (मुखे) । जयदुर्गादेवतायै नमः (हृदये) । दुं बीजाय नमः (गुह्ये) । श्रीं शक्तये नमः (पादयोः) । क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ) । विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) । कर-हृदयादिन्यास--"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" (इस मन्त्र से करें) ध्यान--कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां, शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्, सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं, ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धसंघैः ॥ मूलमन्त्र--"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" ।
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