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जयदुर्गा मंत्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

माँ जयदुर्गा मंत्र विनियोग न्यास ध्यान और जप विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवताजयदुर्गा

दुर्गा साधनानौ दुर्गा मंत्रजयदुर्गा मंत्ररुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में '११. शान्तिदुर्गादि नौ दुर्गाओं के मन्त्र-विधान' के अंतर्गत '८. जयदुर्गा' में जयदुर्गा मन्त्र का विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादिन्यास, ध्यान और मूलमन्त्र दिया गया है।

मूल मंत्र

८. जयदुर्गा

विनियोग

अस्य श्रीजयदुर्गामन्त्रस्य दुर्वासा ऋषिः ककुप् छन्दः जयदुर्गा देवता दुं बीजं श्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे मन्त्रजपे विनियोगः ।

ऋष्यादिन्यास

दुर्वाससे ऋषये नमः (शिरसि) । ककुप् छन्दसे नमः (मुखे) । जयदुर्गादेवतायै नमः (हृदये) । दुं बीजाय नमः (गुह्ये) । श्रीं शक्तये नमः (पादयोः) । क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ) । विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) ।

कर-हृदयादिन्यास

"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" (इस मन्त्र से करें)

ध्यान

कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां,
शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्,
सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं,
ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धसंघैः ॥

मूलमन्त्र

"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" ।

बीज मंत्र

दुंश्रींक्लीं

साधना विधि

स्रोत के अनुसार जयदुर्गा मन्त्रजप के लिए पहले विनियोग करना है। फिर ऋष्यादिन्यास और कर-हृदयादिन्यास करके ध्यान के बाद मूलमन्त्र का जप बताया गया है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • जयदुर्गा मन्त्रजप
  • श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थ विनियोग
  • ऋष्यादिन्यास
  • कर-हृदयादिन्यास
  • ध्यान और मूलमन्त्र जप

लाभ

  • श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्धि
  • जयदुर्गा मन्त्रजप
  • ऋष्यादिन्यास
  • कर-हृदयादिन्यास
  • ध्यान

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

८. जयदुर्गा--अस्य श्रीजयदुर्गामन्त्रस्य दुर्वासा ऋषिः ककुप् छन्दः जयदुर्गा देवता दुं बीजं श्रीं शक्तिः क्लीं कीलकं मम श्रीजयदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे मन्त्रजपे विनियोगः । ऋष्यादिन्यास--दुर्वाससे ऋषये नमः (शिरसि) । ककुप् छन्दसे नमः (मुखे) । जयदुर्गादेवतायै नमः (हृदये) । दुं बीजाय नमः (गुह्ये) । श्रीं शक्तये नमः (पादयोः) । क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ) । विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) । कर-हृदयादिन्यास--"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" (इस मन्त्र से करें) ध्यान--कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां, शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्, सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं, ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धसंघैः ॥ मूलमन्त्र--"दुं दुं रक्षिणि स्वाहा" ।

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