लक्ष्मी कवचरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ लक्ष्मी सर्वैश्वर्यप्रद कवच पाठ और धारण विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ श्रीपद्मालया
लक्ष्मी साधनाकमला साधनाकवच मंत्रऐश्वर्यप्रद कवचरुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में '१०. महाविद्या श्रीकमला की उपासना' के अंतर्गत '(घ) लक्ष्मी-कवच-विधान' में लक्ष्मी-कवच का विनियोग और कवच-पाठ दिया गया है।
मूल मंत्र
(घ) लक्ष्मी-कवच-विधान विनियोग अस्य श्री सर्वैश्वर्यप्रद लक्ष्मीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः पंक्तिश्छन्दः श्रीपद्मालया देवता सिद्धैश्वर्यजयप्राप्त्यर्थे विनियोगः । मस्तकं पातु मे पद्मा, कण्ठं पातु हरिप्रिया । नासिकां पातु मे लक्ष्मीः, कमला पातु लोचनम् ॥१॥ केशान् केशवकान्ता च, कपालं कमलालया । जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं, स्कन्धं सम्पत्प्रदा सदा ॥२॥ ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु । ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा, वक्षः सदाऽवतु ॥३॥ पातु श्रीं मम कङ्कालं, बाहुयुग्मं च ते नमः । ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे सततं चिरम् ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम् । ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वाङ्गं पातु मे सदा ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ।
बीज मंत्र
ॐश्रींह्रीं
साधना विधि
स्रोत के अनुसार लक्ष्मी-कवच का विनियोग करके श्रीं बीज से न्यास एवं लक्ष्मी का ध्यान कर कवच-पाठ करना है। स्रोत में इस कवच के पाठ एवं धारण से इन्द्रादि देवों द्वारा ऐश्वर्य प्राप्ति का उल्लेख है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- लक्ष्मी-कवच पाठ
- कवच धारण
- सिद्धैश्वर्यजयप्राप्त्यर्थ
- श्रीं बीज से न्यास
- लक्ष्मी ध्यान
लाभ
- सिद्धैश्वर्यजयप्राप्ति
- ऐश्वर्य प्राप्ति
- लक्ष्मी-कवच पाठ
- कवच धारण
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
इसी प्रकार लक्ष्मी की उपासना करने वाले को 'लक्ष्मी-कवच' का पाठ करने का भी शास्त्रों में आदेश दिया है। यहां एक छोटा-सा 'लक्ष्मी-कवच' हम लिख रहे हैं, जिसका कथन स्वयं हरि-विष्णु ने नारद के आग्रह पर किया था। इस कवच का पाठ एवं धारण करके इन्द्रादि देवों ने ऐश्वर्य प्राप्त किया था। अतः इसे ऐश्वर्यप्रद भी कहा है। मूल विधान इस प्रकार है-- (घ) लक्ष्मी-कवच-विधान विनियोग--अस्य श्री सर्वैश्वर्यप्रद लक्ष्मीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः पंक्तिश्छन्दः श्रीपद्मालया देवता सिद्धैश्वर्यजयप्राप्त्यर्थे विनियोगः । यह विनियोग करके श्रीं बीज से न्यास एवं लक्ष्मी का ध्यान करके कवच पाठ करें । मस्तकं पातु मे पद्मा, कण्ठं पातु हरिप्रिया । नासिकां पातु मे लक्ष्मीः, कमला पातु लोचनम् ॥१॥ केशान् केशवकान्ता च, कपालं कमलालया । जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं, स्कन्धं सम्पत्प्रदा सदा ॥२॥ ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु । ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा, वक्षः सदाऽवतु ॥३॥ पातु श्रीं मम कङ्कालं, बाहुयुग्मं च ते नमः । ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे सततं चिरम् ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम् । ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वाङ्गं पातु मे सदा ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः ।
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