महाविद्या वनदुर्गा महामन्त्र प्रयोगरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
माँ महाविद्या वनदुर्गा मूल मंत्र और साधना विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ अन्तर्यामी नारायण-किरातरूपेश्वर महाविद्या वनदुर्गा
दुर्गा साधनावनदुर्गा मंत्रमहाविद्या साधनातांत्रिक मंत्र प्रयोगरुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में '(ग) महाविद्या वन दुर्गा-मन्त्र-प्रयोग' शीर्षक के अंतर्गत पूर्वाभास, विनियोग, न्यास, ध्यान, मूलमन्त्र और कन्या-पूजन सम्बन्धी निर्देश दिया गया है।
मूल मंत्र
(ग) महाविद्या वन दुर्गा-मन्त्र-प्रयोग मन्त्र-विधान : विनियोग--अस्य श्रीमहाविद्या वनदुर्गा महामन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः अन्तर्यामि नारायण-किरातरूपेश्वर महाविद्या वनदुर्गादेवता हुं बीजं, स्वाहा शक्तिः क्लीं कीलकं मम वनदुर्गाप्रसाद-सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यास--ईश्वरऋषये नमः (शिरसि), पङ्क्तिच्छन्दसे नमः (मुखे), अन्तर्यामिनारायण-किरातरूपेश्वर-महाविद्यावनदुर्गादेवताभ्यो नमः (हृदये), हुं बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। कर-हृदयादि-न्यास--हंसिनी ह्वां (अंगु० हृदयाय०), शङ्खिनी ह्रौं (तर्जनी० शिरसे०), चक्रिणी हूं (मध्यमा० शिखा०), गदिनी ह्लं (अना० कवचाय०), शूलिनी ह्लौं (कनि० नेत्र०), त्रिशूलवरधारिणी ह्वः (करतल० अस्त्राय०)। ध्यान-- असिशङ्खकृपाणखेटबाणान्, सधनुशूलकतर्जनीं दधाना। मम सा महिषोत्तमाङ्गसंस्था, नवदुर्गासदृशी श्रियेऽस्तु दुर्गा॥१॥ हेमप्रख्यामिन्दुखण्डात्तमौलिं, दुष्टारिष्टाभीतिहस्तां त्रिनेत्राम्। हेमाब्जस्थां पीतवस्त्रां प्रसन्नां, देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि॥२॥ महिषमस्तकनृत्यविनोदिनि, स्फुटरणन्मणिनूपुरमेखले। जननि रक्षण-मोक्षविधायिनि, जयसि शुम्भ-निशुम्भनिषूदिनि॥३॥ निर्जित्य दैत्यानखिलाञ्जगद्रुहः, शान्तामनन्तोरगभोगशायिनीम्। भक्ताखिलोपद्रवहेतुभञ्जिनीं, देवीं प्रपद्ये दिविषद्भिरीडिताम्॥४॥ मूलमन्त्र--ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं हुं उत्तिष्ठ पुरुषि किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितं यदि शक्यमशक्यं वा दुर्गं भगवति तन्मे शमय स्वाहा।
बीज मंत्र
ॐश्रींह्लींक्लींहुं
साधना विधि
अस्य श्रीमहाविद्या वनदुर्गा महामन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः अन्तर्यामि नारायण-किरातरूपेश्वर महाविद्या वनदुर्गादेवता हुं बीजं, स्वाहा शक्तिः क्लीं कीलकं मम वनदुर्गाप्रसाद-सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः। इस उपासना में कन्या पूजन करना अत्यावश्यक है। विधि आगे देखें।
प्रयोग — कब और कहाँ
- महाविद्या वनदुर्गा मूलमन्त्र जप
- वनदुर्गा प्रसाद सिद्धि
- भय शमन
- दुर्ग शमन
- कन्या पूजन सहित उपासना
- बीजमन्त्र संयोजन साधना
लाभ
- इष्टदेव की कृपा प्राप्ति
- मन्त्र के वास्तविक स्वरूप का दर्शन
- यथेष्ट लाभ में सहायक
- वनदुर्गा प्रसाद सिद्धि
- भय और दुर्ग का शमन
- कन्या पूजन सहित उपासना
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
(ग) महाविद्या वन दुर्गा-मन्त्र-प्रयोग (क) पूर्वाभास--तन्त्रशास्त्रों की यह विशेषता है कि आराध्य देवता की आराधना को सामान्य से अधिक तीव्र और तीव्रतर बनाने के लिए उसके साथ बीजमन्त्रों का संयोजन करने का आदेश करते हैं। आराधकगण भी उसी पद्धति से इष्टदेव की कृपा प्राप्त कर मन्त्र के वास्तविक स्वरूप को देख लेते हैं। इसी से मन्त्रों में विविधता आती है और यथेष्ट लाभ पाने में वे सहकारी बनते हैं। महाविद्या वनदुर्गा के भी अनेक मन्त्र हैं, अनेक साधकों ने उनका दर्शन किया है तथा उसके प्रयोगों को भी प्रस्तुत किया है। (ख) मन्त्र-विधान : विनियोग--अस्य श्रीमहाविद्या वनदुर्गा महामन्त्रस्य ईश्वर ऋषिः पङ्क्तिश्छन्दः अन्तर्यामि नारायण-किरातरूपेश्वर महाविद्या वनदुर्गादेवता हुं बीजं, स्वाहा शक्तिः क्लीं कीलकं मम वनदुर्गाप्रसाद-सिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यास--ईश्वरऋषये नमः (शिरसि), पङ्क्तिच्छन्दसे नमः (मुखे), अन्तर्यामिनारायण-किरातरूपेश्वर-महाविद्यावनदुर्गादेवताभ्यो नमः (हृदये), हुं बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), क्लीं कीलकाय नमः (नाभौ), विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे)। कर-हृदयादि-न्यास--हंसिनी ह्वां (अंगु० हृदयाय०), शङ्खिनी ह्रौं (तर्जनी० शिरसे०), चक्रिणी हूं (मध्यमा० शिखा०), गदिनी ह्लं (अना० कवचाय०), शूलिनी ह्लौं (कनि० नेत्र०), त्रिशूलवरधारिणी ह्वः (करतल० अस्त्राय०)। ध्यान-- असिशङ्खकृपाणखेटबाणान्, सधनुशूलकतर्जनीं दधाना। मम सा महिषोत्तमाङ्गसंस्था, नवदुर्गासदृशी श्रियेऽस्तु दुर्गा॥१॥ हेमप्रख्यामिन्दुखण्डात्तमौलिं, दुष्टारिष्टाभीतिहस्तां त्रिनेत्राम्। हेमाब्जस्थां पीतवस्त्रां प्रसन्नां, देवीं दुर्गां दिव्यरूपां नमामि॥२॥ महिषमस्तकनृत्यविनोदिनि, स्फुटरणन्मणिनूपुरमेखले। जननि रक्षण-मोक्षविधायिनि, जयसि शुम्भ-निशुम्भनिषूदिनि॥३॥ निर्जित्य दैत्यानखिलाञ्जगद्रुहः, शान्तामनन्तोरगभोगशायिनीम्। भक्ताखिलोपद्रवहेतुभञ्जिनीं, देवीं प्रपद्ये दिविषद्भिरीडिताम्॥४॥ मूलमन्त्र--ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं हुं उत्तिष्ठ पुरुषि किं स्वपिषि भयं मे समुपस्थितं यदि शक्यमशक्यं वा दुर्गं भगवति तन्मे शमय स्वाहा। इस उपासना में कन्या पूजन करना अत्यावश्यक है। विधि आगे देखें।
[object Object]