सीताराम मन्त्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी
सीताराम मंत्र प्रसाद सिद्धि जप विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ सीताराम
सीताराम मंत्रश्रीराम मंत्रसीता मंत्रवैष्णव मंत्ररुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में सीताराम मन्त्र के अंतर्गत विनियोग, ऋष्यादि, कर हृदयादि न्यास, ध्यान और मूल मन्त्र दिया गया है। विनियोग में श्रीसीताराम प्रसादसिद्ध्यर्थे जप का उल्लेख है।
मूल मंत्र
सीताराम मन्त्र--अस्य श्री सीताराममन्त्रस्य सुयज्ञ ऋषिः जगती छन्दः सीतारामदेवता श्रीं बीजं स्वाहा शक्तिः मम श्रीसीताराम प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। ऋष्यादि०--सुयज्ञर्षये नमः (शिरसि), जगती छन्दसे नमः (मुखे), सीतारामदेवताभ्यां नमः (हृदये), श्रीं बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वांगे)। कर हृदयादि न्यास--ॐ क्लीं (अंगु० हृदयाय०) श्रीं श्रीं (तर्जनी० शिरसे०), रां रामाय नमः (मध्यमा० शिखायै०), श्रीं सीतायै स्वाहा (अना० कवचाय०), रां श्रीं श्रीं (कनि० नेत्रद्वयाय०), क्लीं ॐ (करतल० अस्त्राय०)। ध्यान--तप्ताष्टापदभां विदेहतनयां रामांकपीठस्थितां, तद्वक्त्रेक्षणतत्परामनिमिषां हस्तस्थिताब्जोत्पलाम्। रामं दाशरथिं रमाकुचलसद् हस्तं तदास्थेक्षणं, कस्तूरीरचितं स्वदक्षिण करं ध्यायेदभीष्टाप्तये॥ मूल मन्त्र--ॐ क्लीं श्रीं श्रीं रां रामाय नमः श्रीं सीतायै स्वाहा रां श्रीं श्रीं क्लीं ॐ।
बीज मंत्र
ॐक्लींश्रींरां
साधना विधि
स्रोत में सीताराम मन्त्र के लिए विनियोग, ऋष्यादि और कर हृदयादि न्यास के बाद ध्यान तथा मूल मन्त्र 'ॐ क्लीं श्रीं श्रीं रां रामाय नमः श्रीं सीतायै स्वाहा रां श्रीं श्रीं क्लीं ॐ' दिया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- सीताराम मन्त्र जप
- श्रीसीताराम प्रसाद सिद्धि
- ऋष्यादि
- कर हृदयादि न्यास
- ध्यान
लाभ
- श्रीसीताराम प्रसादसिद्धि के लिए जप विनियोग दिया गया
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
सीताराम मन्त्र--अस्य श्री सीताराममन्त्रस्य सुयज्ञ ऋषिः जगती छन्दः सीतारामदेवता श्रीं बीजं स्वाहा शक्तिः मम श्रीसीताराम प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः। ऋष्यादि०--सुयज्ञर्षये नमः (शिरसि), जगती छन्दसे नमः (मुखे), सीतारामदेवताभ्यां नमः (हृदये), श्रीं बीजाय नमः (गुह्ये), स्वाहा शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वांगे)। कर हृदयादि न्यास--ॐ क्लीं (अंगु० हृदयाय०) श्रीं श्रीं (तर्जनी० शिरसे०), रां रामाय नमः (मध्यमा० शिखायै०), श्रीं सीतायै स्वाहा (अना० कवचाय०), रां श्रीं श्रीं (कनि० नेत्रद्वयाय०), क्लीं ॐ (करतल० अस्त्राय०)। ध्यान--तप्ताष्टापदभां विदेहतनयां रामांकपीठस्थितां, तद्वक्त्रेक्षणतत्परामनिमिषां हस्तस्थिताब्जोत्पलाम्। रामं दाशरथिं रमाकुचलसद् हस्तं तदास्थेक्षणं, कस्तूरीरचितं स्वदक्षिण करं ध्यायेदभीष्टाप्तये॥ मूल मन्त्र--ॐ क्लीं श्रीं श्रीं रां रामाय नमः श्रीं सीतायै स्वाहा रां श्रीं श्रीं क्लीं ॐ।
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