सूर्योपासना मन्त्र और नमस्कार विधिरुद्रयामल तंत्रहिन्दी
सूर्योपासना वैदिक मंत्र सूर्य गायत्री और तूचाकल्प 24 नमस्कार विधि -रुद्रयामल तंत्र
श्रीदेवता✦ श्री सवितृ सूर्यनारायण
नवग्रह साधनासूर्य साधनासूर्य गायत्रीसूर्य नमस्कार मंत्ररुद्रयामल तंत्र
तंत्र संदर्भ
स्रोत में 'रुद्रयामलोक्त नवग्रह-साधना' के अंतर्गत ग्रहों की विशिष्टता के बाद सूर्योपासना के मन्त्र, सूर्य गायत्री और तन्त्रमिश्रित वैदिक मन्त्रों वाले तूचाकल्प नमस्कार का विधान दिया गया है।
मूल मंत्र
रुद्रयामलोक्त नवग्रह-साधना सूर्य ध्यान-- ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी, हारीहिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥ (ख) सूर्योपासना के मन्त्र १. वैदिक अष्टाक्षर मन्त्र--ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः । २. लक्ष्मी प्राप्ति के लिए-- (क) ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः श्रीं । (ख) ॐ श्रीं क्लीं हीं घृणिः सूर्य आदित्यः हीं क्लीं श्रीं ॐ प्रयच्छ मे लक्ष्मीम् । ३. सूर्य गायत्री--ॐ सप्ततुरंगाय विद्महे, सहस्रकिरणाय धीमहि, तन्नो रविः प्रचोदयात् । (ग) तूचाकल्प नमस्कार (२४ नमस्कार विधि) ध्यान करें-- ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासन-संनिविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी, हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥ १. ॐ हां उद्यन्नद्य मित्रमहः हां ॐ मित्राय नमः । २. ॐ हीं आरोहन्नुत्तरां दिवं हीं ॐ रवये नमः । ३. ॐ हूं हृद्रोगं मम सूर्य हूं ॐ सूर्याय नमः । ४. ॐ हैं हरिमाणं च नाशय हैं ॐ भानवे नमः । ५. ॐ हों शुकेषु मे हरिमाणं हों ॐ खगाय नमः । ६. ॐ हः रोपणाकासु दध्मसि हः ॐ पूष्णे नमः । ७. ॐ हां अथो हारिद्रवेषु मे हां ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । ८. ॐ हीं हरिमाणं निदध्मसि हीं ॐ मरीचये नमः । ९. ॐ हूं उदगादयमादित्यः हूं आदित्याय नमः । १०. ॐ हूं विश्वेन सहसा सह हूं ॐ सवित्रे नमः । ११. ॐ हां द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् हां ॐ अर्काय नमः । १२. ॐ हः मो अहं द्विषते रधम् हः ॐ भास्कराय नमः । १३. ॐ हां हीं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हां हीं ॐ मित्ररविभ्यां नमः । १४. ॐ हूं हूं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय हूं हूं ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः । १५. ॐ हों हः शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि हों हः ॐ खगपूषभ्यां नमः । १६. हां हीं अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि हां हीं ॐ हिरण्यगर्भमरीचिभ्यां नमः । १७. ॐ हूं हूं उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह हूं हूं ॐ आदित्य सवितृभ्यां नमः । १८. ॐ हां हः द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रधं हां हः ॐ अर्कभास्कराभ्यां नमः । १९. हां हीं हूं हैं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय हां हीं हूं हैं ॐ मित्ररविसूर्यभानुभ्यो नमः । २०. ॐ हों हः हां हीं शुकेषु हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि हों हः हां हीं खगपूषहिरण्यगर्भमरीचिभ्यो नमः । २१. ॐ हूं हूं हों हः उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रध हूं हूं हों हः ॐ आदित्यसवितर्क भास्करेभ्यो नमः । २२-२४. ॐ हां हीं हूं हैं हों हः हां हीं हूं हैं हों हः उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥१॥ शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि ॥२॥ उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रधम् ॥३॥ हां हीं हूं हैं हों हः हां हीं हूं हैं हों हः ॐ मित्ररविसूर्यभानुखगपूषहिरण्यगर्भमरीच्यादित्यसवितर्क भास्करेभ्यो नमः । २५. ॐ श्री सविते सूर्यनारायणाय नमः । आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने । जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नैव जायते ॥१॥ नमो धर्मविधानाय नमस्ते कृतसाक्षिणे । नमः प्रत्यक्षदेवाय भास्कराय नमो नमः ॥२॥ अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम् ॥३॥
बीज मंत्र
ॐश्रींक्लींहींहांहूंहैंहोंहः
साधना विधि
स्रोत में सूर्य को नारायण स्वरूप बताकर सूर्योपासना को ग्रह शान्ति, आयुष्य, आरोग्य, कीर्ति, धन, पुत्र, पौत्र और सौभाग्य के लिए उपयोगी कहा गया है। तूचाकल्प नमस्कार में आचमन, प्राणायाम, संकल्प, पात्र में जल लेकर गन्ध, अक्षत और पुष्प रखने, सूर्यनारायण ध्यान करने और २४ नमस्कारों सहित २५वें नमस्कार तथा फलश्लोकों के बाद तीर्थ जल से आचमन का विधान दिया गया है।
प्रयोग — कब और कहाँ
- सूर्योपासना
- वैदिक अष्टाक्षर सूर्य मन्त्र
- लक्ष्मी प्राप्ति मन्त्र
- सूर्य गायत्री
- तूचाकल्प नमस्कार
- सूर्य नमस्कार २४ विधि
- ग्रह शान्ति
- सर्व रोग निवारण
लाभ
- ग्रह शान्ति के लिए उपयोगी बताया गया
- आयुष्य और आरोग्य प्राप्ति का वर्णन
- कीर्ति, धन, पुत्र, पौत्र और सौभाग्य प्राप्ति का वर्णन
- सर्व रोग निवारक प्रयोग कहा गया
- दारिद्र्य न होने का फलश्लोक दिया गया
- अकालमृत्युहरण और सर्वव्याधिविनाशन का वर्णन
मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)
रुद्रयामलोक्त नवग्रह-साधना (क) ग्रहों की विशिष्टता शास्त्रों का वचन है कि-- ग्रहा राज्यं प्रयच्छन्ति ग्रहा राज्यं हरन्ति च । इसके अनुसार ग्रहों की शक्ति अत्यन्त प्रभावकारी है। इसीलिए जन्मकुण्डली, वर्षकुण्डली अथवा प्रश्नकुण्डली के अनुसार ग्रहों की अनुकूलता को सभी चाहते हैं। सूर्यादि नौ ग्रहों को देवस्वरूप मानकर उन्हें प्रसन्न रखने के लिए ज्योतिष शास्त्र एवं तन्त्रादि शास्त्रों में अनेक प्रकार के उपाय दिखाए गए हैं। ग्रहों की स्थिति, दृष्टि अथवा संगति के आधार पर भी उनकी अनुकूलता और प्रतिकूलता का ज्ञान होता है। ये अपने क्षेत्रस्थान के अनुसार दशाओं में भी अपना प्रभाव दिखाते हैं। अतः यदि ग्रह अनुकूल न हों तो उस समय उनकी शान्ति के लिए प्रयत्न करना आवश्यक होता है। सौम्य, सम और क्रूर भाव वाले ग्रहों के वैदिक, पौराणिक एवं तान्त्रिक मन्त्र अनेक छोटे-बड़े रूपों में प्राप्त होते हैं। रुद्रयामल में सूर्य की उपासना को अधिक महत्त्व दिया गया है, क्योंकि सूर्य सभी ग्रहों का अधिपति है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह कहा जाता है कि सूर्य के तेज से ही अन्य ग्रह तेजोमय होते हैं। आकाश में चमकने वाले ग्रह ही नहीं, अपितु छोटे-बड़े सभी तारे भी सूर्य से ही प्रभावित हैं। अतः सर्वप्रथम यहां सूर्योपासना के सम्बन्ध में रुद्रयामल के विचार एवं प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं। सूर्य को नारायण स्वरूप ही बतलाया गया है। सूर्य का ध्यान करते समय उसके मण्डल में नारायण का ध्यान निम्न पद्य से किया जाता है-- ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी, हारीहिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥ सूर्योपासना ग्रह शान्ति एवं आयुष्य, आरोग्य, कीर्ति, धन, पुत्र, पौत्र, सौभाग्य आदि की प्राप्ति के लिए अत्यन्त उपयोगी है। (ख) सूर्योपासना के मन्त्र १. वैदिक अष्टाक्षर मन्त्र--ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः । २. लक्ष्मी प्राप्ति के लिए--(क) ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः श्रीं । (ख) ॐ श्रीं क्लीं हीं घृणिः सूर्य आदित्यः हीं क्लीं श्रीं ॐ प्रयच्छ मे लक्ष्मीम् । ३. सूर्य गायत्री--ॐ सप्ततुरंगाय विद्महे, सहस्रकिरणाय धीमहि, तन्नो रविः प्रचोदयात् । इनके वैदिक मन्त्र, यन्त्र और तान्त्रिक बीज मन्त्र प्रसिद्ध हैं। अतः उनका यहां तन्त्रमिश्रित वैदिक मन्त्रों वाले सर्व रोग निवारक १-तूचाकल्प और २-हंसकल्प के २४-२४ नमस्कारों के प्रयोग दे रहे हैं। ये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। इनका प्रयोग करने से बहुत ही लाभ होता है। (ग) तूचाकल्प नमस्कार (२४ नमस्कार विधि) आचम्य प्राणानायम्य । संकल्पः । ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीसवितृ सूर्यनारायण प्रीत्यर्थं च तूचाकल्पविधिना नमस्काराख्यं कर्म करिष्ये । [पात्र में जल लेकर उसमें गन्ध, अक्षत और पुष्प लेकर] ध्यान करें-- ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती, नारायणः सरसिजासन-संनिविष्टः । केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी, हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥ १. ॐ हां उद्यन्नद्य मित्रमहः हां ॐ मित्राय नमः । २. ॐ हीं आरोहन्नुत्तरां दिवं हीं ॐ रवये नमः । ३. ॐ हूं हृद्रोगं मम सूर्य हूं ॐ सूर्याय नमः । ४. ॐ हैं हरिमाणं च नाशय हैं ॐ भानवे नमः । ५. ॐ हों शुकेषु मे हरिमाणं हों ॐ खगाय नमः । ६. ॐ हः रोपणाकासु दध्मसि हः ॐ पूष्णे नमः । ७. ॐ हां अथो हारिद्रवेषु मे हां ॐ हिरण्यगर्भाय नमः । ८. ॐ हीं हरिमाणं निदध्मसि हीं ॐ मरीचये नमः । ये नमस्कार सूर्य नमस्कार व्यायाम की पद्धति से भी किए जाते हैं। ९. ॐ हूं उदगादयमादित्यः हूं आदित्याय नमः । १०. ॐ हूं विश्वेन सहसा सह हूं ॐ सवित्रे नमः । ११. ॐ हां द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् हां ॐ अर्काय नमः । १२. ॐ हः मो अहं द्विषते रधम् हः ॐ भास्कराय नमः । १३. ॐ हां हीं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हां हीं ॐ मित्ररविभ्यां नमः । १४. ॐ हूं हूं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय हूं हूं ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः । १५. ॐ हों हः शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि हों हः ॐ खगपूषभ्यां नमः । १६. हां हीं अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि हां हीं ॐ हिरण्यगर्भमरीचिभ्यां नमः । १७. ॐ हूं हूं उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह हूं हूं ॐ आदित्य सवितृभ्यां नमः । १८. ॐ हां हः द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रधं हां हः ॐ अर्कभास्कराभ्यां नमः । १९. हां हीं हूं हैं उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय हां हीं हूं हैं ॐ मित्ररविसूर्यभानुभ्यो नमः । २०. ॐ हों हः हां हीं शुकेषु हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि हों हः हां हीं खगपूषहिरण्यगर्भमरीचिभ्यो नमः । २१. ॐ हूं हूं हों हः उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रध हूं हूं हों हः ॐ आदित्यसवितर्क भास्करेभ्यो नमः । २२-२४. ॐ हां हीं हूं हैं हों हः हां हीं हूं हैं हों हः उद्यन्नद्य मित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवं हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥१॥ शुकेषु मे हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि अथो हारिद्रवेषु मे हरिमाणं निदध्मसि ॥२॥ उदगादयमादित्यो विश्वेन सहसा सह द्विषन्तं मह्यं रन्धयन् मो अहं द्विषते रधम् ॥३॥ हां हीं हूं हैं हों हः हां हीं हूं हैं हों हः ॐ मित्ररविसूर्यभानुखगपूषहिरण्यगर्भमरीच्यादित्यसवितर्क भास्करेभ्यो नमः । (तीनों नमस्कार एक साथ करें।) २५. ॐ श्री सविते सूर्यनारायणाय नमः । आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने । जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नैव जायते ॥१॥ नमो धर्मविधानाय नमस्ते कृतसाक्षिणे । नमः प्रत्यक्षदेवाय भास्कराय नमो नमः ॥२॥ अनेन तूचाकल्पनमस्काराख्येन कर्मणा भगवान् श्रीसवितृसूर्यनारायणः प्रीयताम् । न मम । अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । सूर्यपादोदकं तीर्थं जठरे धारयाम्यहम् ॥३॥ इससे तीर्थ जल लेकर आचमन करें ।
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