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वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्ररुद्रयामल तंत्रहिन्दी

वैष्णवाष्टाक्षरी मंत्र ॐ नमो नारायणाय जप विधि -रुद्रयामल तंत्र

श्रीदेवतापरमात्मा नारायण

वैष्णव उपासनानारायण मंत्रविष्णु साधनातांत्रिक मंत्र विधानरुद्रयामल तंत्र

तंत्र संदर्भ

स्रोत में 'वैष्णव उपासना के तान्त्रिक विधान' के अंतर्गत '(क) वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्र' का विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादिन्यास, अष्टांगन्यास, ध्यान, मूल मन्त्र और तीन विशिष्ट प्रयोग दिए गए हैं।

मूल मंत्र

वैष्णव उपासना के तान्त्रिक विधान

दशमहाविद्या के समान ही भगवान् विष्णु के दस अवतार प्रसिद्ध हैं। पौराणिक विधानों से श्लोकात्मक मन्त्रों द्वारा इन अवतारों की उपासना की जाती है। रुद्रयामल तन्त्र तथा अन्य तन्त्रों में इन देवताओं की उपासना के लिए तान्त्रिक मन्त्र-विधान भी प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ मन्त्रों का यहां उल्लेख करना आवश्यक मानकर लिख रहे हैं।

(क) वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्र--विनियोग--अस्य श्रीवैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अं बीजं, आय शक्तिः, मम चतुर्वर्गफलप्राप्तये जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास--साध्यनारायणाय ऋषये नमः (शिरसि), देवीगायत्रीछन्दसे नमः (मुखे), परमात्म देवतायै नमः (हृदये), अं बीजाय नमः (गुह्ये), आय शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वांगे)।

कर-हृदयादिन्यास--क्रुद्धोल्काय स्वाहा (अंगुष्ठा० हृदयाय०); महोत्काय स्वाहा (तर्जनी० शिरसे०), वीरोल्काय (मध्यमा० शिखायै०); धूल्काय स्वाहा (अना० कवचाय०), सहस्रोल्काय स्वाहा (कनि० अस्त्राय०)।

अष्टांगन्यास--ॐ (हृत्), नं (शिरः); मों (शिखा); नां (कवचम्), रां (नेत्रम्), यं (अस्त्रम्), णां उदानाय नमः (उदरस्थाने); यं पृष्ठाय नमः (पृष्ठभागे)।

ध्यान--अर्कौकाभं किरीटान्वितमकरलसत्कुण्डलं दीप्तिराजत्-
केयूरं कौस्तुभाभाशबलरुचिरहारं सपीताम्बरं च ।
नानारत्नांशु भिन्नाभरणशतयुजं श्रीधराश्लिष्टपार्श्वं,
वन्दे दोःसतत्वचक्राम्बुरुहदरगदं विश्ववन्द्यं मुकुन्दम् ॥

मूल मन्त्र--ॐ नमो नारायणाय । (३२ हजार जप)

विशिष्ट प्रयोग--(१) उपर्युक्त मन्त्र से दही, मधु, घृत और चार अंगुल गडूची की समिधा से युक्त हवन करने से मृत्यु का निवारण होता है। (२) शुद्ध जल को २५ बार अभिमन्त्रित करके नित्य पीने से रोग नाश होता है। (३) प्रति दिन अपनी भोजन सामग्री को सात बार अभिमन्त्रित करके उपयोग में लेने से आरोग्य प्राप्ति होती है।

बीज मंत्र

अंआय

साधना विधि

स्रोत में वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्र के लिए विनियोग, ऋष्यादिन्यास, कर-हृदयादिन्यास, अष्टांगन्यास और ध्यान के बाद मूल मन्त्र 'ॐ नमो नारायणाय' का ३२ हजार जप बताया गया है। विशिष्ट प्रयोगों में दही, मधु, घृत और चार अंगुल गडूची की समिधा से युक्त हवन द्वारा मृत्यु निवारण; शुद्ध जल को २५ बार अभिमन्त्रित कर नित्य पीने से रोग नाश; और भोजन सामग्री को सात बार अभिमन्त्रित कर उपयोग में लेने से आरोग्य प्राप्ति बताई गई है।

प्रयोग — कब और कहाँ

  • वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्र जप
  • नारायण उपासना
  • मृत्यु निवारण हवन
  • रोग नाश हेतु अभिमन्त्रित जल
  • आरोग्य प्राप्ति हेतु भोजन अभिमन्त्रण

लाभ

  • मृत्यु निवारण हेतु हवन प्रयोग दिया गया
  • रोग नाश हेतु अभिमन्त्रित जल प्रयोग दिया गया
  • आरोग्य प्राप्ति हेतु भोजन अभिमन्त्रण प्रयोग दिया गया
  • चतुर्वर्गफलप्राप्ति के लिए जप विनियोग दिया गया

मूल पाठ (तंत्र से उद्धरण)

वैष्णव उपासना के तान्त्रिक विधान दशमहाविद्या के समान ही भगवान् विष्णु के दस अवतार प्रसिद्ध हैं। पौराणिक विधानों से श्लोकात्मक मन्त्रों द्वारा इन अवतारों की उपासना की जाती है। रुद्रयामल तन्त्र तथा अन्य तन्त्रों में इन देवताओं की उपासना के लिए तान्त्रिक मन्त्र-विधान भी प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ मन्त्रों का यहां उल्लेख करना आवश्यक मानकर लिख रहे हैं। (क) वैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्र--विनियोग--अस्य श्रीवैष्णवाष्टाक्षरी मन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता अं बीजं, आय शक्तिः, मम चतुर्वर्गफलप्राप्तये जपे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास--साध्यनारायणाय ऋषये नमः (शिरसि), देवीगायत्रीछन्दसे नमः (मुखे), परमात्म देवतायै नमः (हृदये), अं बीजाय नमः (गुह्ये), आय शक्तये नमः (पादयोः), विनियोगाय नमः (सर्वांगे)। कर-हृदयादिन्यास--क्रुद्धोल्काय स्वाहा (अंगुष्ठा० हृदयाय०); महोत्काय स्वाहा (तर्जनी० शिरसे०), वीरोल्काय (मध्यमा० शिखायै०); धूल्काय स्वाहा (अना० कवचाय०), सहस्रोल्काय स्वाहा (कनि० अस्त्राय०)। अष्टांगन्यास--ॐ (हृत्), नं (शिरः); मों (शिखा); नां (कवचम्), रां (नेत्रम्), यं (अस्त्रम्), णां उदानाय नमः (उदरस्थाने); यं पृष्ठाय नमः (पृष्ठभागे)। ध्यान--अर्कौकाभं किरीटान्वितमकरलसत्कुण्डलं दीप्तिराजत्- केयूरं कौस्तुभाभाशबलरुचिरहारं सपीताम्बरं च । नानारत्नांशु भिन्नाभरणशतयुजं श्रीधराश्लिष्टपार्श्वं, वन्दे दोःसतत्वचक्राम्बुरुहदरगदं विश्ववन्द्यं मुकुन्दम् ॥ मूल मन्त्र--ॐ नमो नारायणाय । (३२ हजार जप) विशिष्ट प्रयोग--(१) उपर्युक्त मन्त्र से दही, मधु, घृत और चार अंगुल गडूची की समिधा से युक्त हवन करने से मृत्यु का निवारण होता है। (२) शुद्ध जल को २५ बार अभिमन्त्रित करके नित्य पीने से रोग नाश होता है। (३) प्रति दिन अपनी भोजन सामग्री को सात बार अभिमन्त्रित करके उपयोग में लेने से आरोग्य प्राप्ति होती है।

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