का सरल उत्तर
ध्यान में भगवद-अनुभव: भागवत (3.28.17): निर्मल दृष्टि से हृदय में 'अव्यय ज्योति' दर्शन। 3 स्तर: स्थूल दर्शन (मूर्ति-रूप), प्रकाश-दर्शन (श्वेत/स्वर्णिम प्रकाश), आनंद-अनुभव (तुरीय = ब्रह्म-साक्षात्कार)। भक्ति-परिपक्वता और इष्ट-कृपा से मिलता है — बल-पूर्वक नहीं।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
इस श्रेणी के अन्य प्रश्नोत्तर।