स्थितप्रज्ञ कौन होता है गीता के अनुसार
का सरल उत्तर
सरल उत्तर
स्थितप्रज्ञ (गीता 2.55-72): सब कामनाएं त्यागकर आत्मा में संतुष्ट (2.55); दुःख-सुख-राग-भय-क्रोध से मुक्त (2.56); कछुआ जैसे इंद्रियां समेटे (2.58); समुद्र जैसे अचल — कामनाएं आएं पर विचलित न करें (2.70)। सार: भीतर शांत, बाहर कुछ भी हो।
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