स्थितप्रज्ञ कौन होता है गीता के अनुसार
की चेकलिस्ट
स्थितप्रज्ञ (गीता 2.55-72): सब कामनाएं त्यागकर आत्मा में संतुष्ट (2.55); दुःख-सुख-राग-भय-क्रोध से मुक्त (2.56); कछुआ जैसे इंद्रियां समेटे (2.58); समुद्र जैसे अचल — कामनाएं आएं पर विचलित न करें (2.70)। सार: भीतर शांत, बाहर कुछ भी हो।
- 1स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) की क्या पहचान है? वह कैसे बोलता, बैठता, चलता है?
- 2जब मन की सभी कामनाएं त्याग दे और आत्मा में ही संतुष्ट रहे।
- 3दुःख में उद्विग्न न हो, सुख में लालसा न हो, राग-भय-क्रोध से मुक्त हो।
- 4जैसे कछुआ अपने अंग समेट लेता है, वैसे ही जो इंद्रियों को विषयों से समेट ले — उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
- 5जैसे समुद्र नदियों के जल से भरकर भी अचल रहता है, वैसे ही जिसमें कामनाएं आकर भी विचलित नहीं करतीं — वही शांति पाता है।
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