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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 106

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज। बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥106॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

प्रभु के वचन कानों से सुनकर वानर समूह तृप्त नहीं होते। वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलों को पकड़ते हैं॥106॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 106 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik