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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 115

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

नाथ जबहिं कोसलपुरीं हो‍इहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥115॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे नाथ! जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा॥115॥

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