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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 27

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेऊँ चराचर झारि॥27॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

(वह बोला- अरे मूर्ख!) कुंभकर्ण- ऐसा मेरा भाई है, इन्द्र का शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने संपूर्ण जड़-चेतन जगत्‌ को जीत लिया है!॥27॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 27 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik