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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 2

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥2॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं॥2॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 2 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik