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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 78

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥78॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के बस हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त की शांति हो सकती है?॥78॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 78 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik