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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 7

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात। नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात॥7॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

ऐसा कहकर, नेत्रों में (करुणा का) जल भरकर और पति के चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीर से मंदोदरी ने कहा- हे नाथ! श्री रघुनाथजी का भजन कीजिए, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाए॥7॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 7 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik