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श्रीरामचरितमानस · लंका काण्ड

लंका काण्ड दोहा 92

लंका काण्ड · Lanka Kaand

मूल पाठ

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि होहिं अपार। सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥92॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरों को काटते हैं, वैसे ही वैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयों का सेवन करने से काम (उन्हें भोगने की इच्छा) दिन-प्रतिदिन नया-नया बढ़ता जाता है॥92॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 92 लंका काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik