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श्रीरामचरितमानस · सुन्दर काण्ड

सुन्दर काण्ड दोहा 42

सुन्दर काण्ड · Sundar Kaand

मूल पाठ

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ। ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥42॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिन चरणों की पादुकाओं में भरतजी ने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणों को अभी जाकर इन नेत्रों से देखूँगा॥42॥

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