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श्रीरामचरितमानस · सुन्दर काण्ड

सुन्दर काण्ड दोहा 43

सुन्दर काण्ड · Sundar Kaand

मूल पाठ

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥43॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

(श्री रामजी फिर बोले-) जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है)॥43॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 43 सुन्दर काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik