| उठाएं — प्रसाद तुरंत उठाएं। भूमि पर पड़ा न रहने दें। | प्रसाद को लात या पैर से न हटाएं। |
| स्थिति का आकलन करें: | कूड़ेदान में न फेंकें। |
| स्वच्छ भूमि पर गिरा और प्रसाद ठोस है (लड्डू, बर्फी, फल) — उठाकर जल से धोएं (यदि संभव हो) और ग्रहण करें। गिरा प्रसाद भी प्रसाद ही रहता है। | अपवित्र स्थान (नाली, शौचालय) में न डालें। |
| गंदी भूमि/धूल पर गिरा — उठाकर तुलसी/पीपल जड़ में रखें या गाय/पक्षियों को दें। | अत्यधिक अपराधबोध न रखें — यह दुर्घटना है, पाप नहीं। |
| तरल प्रसाद (पंचामृत, दूध) गिर गया — स्थान को स्वच्छ पानी से धो दें। | — |
| क्षमा प्रार्थना — मन में भगवान से क्षमा मांगें: 'मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु ते।।' | — |
| दोबारा भोग — यदि संभव हो तो नया प्रसाद चढ़ाएं। | — |