| महाशिवरात्रि — चारों प्रहर की पूजा में निशिथ काल (रात 12 बजे के आसपास) की पूजा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। शिव पुराण में इसका विशेष विधान है। | सामान्य गृहस्थ पूजा — रात 12 बजे के बाद (निशिथ काल) सामान्य पूजा करना अधिकांश परंपराओं में उचित नहीं माना जाता। |
| जन्माष्टमी — भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, अतः रात 12 बजे पूजा और जन्मोत्सव मनाना शुभ और अनिवार्य है। | कारण — इस समय तमोगुण प्रधान होता है और नकारात्मक ऊर्जा सक्रिय मानी जाती है। सात्विक पूजा के लिए यह अनुकूल समय नहीं है। |
| दीपावली लक्ष्मी पूजा — प्रदोष काल से निशिथ काल तक लक्ष्मी पूजा का विधान है। | धर्मसिंधु जैसे निबंध ग्रंथों में गृहस्थों के लिए रात्रि पूजा की समय सीमा सामान्यतः प्रथम प्रहर (रात 9-10 बजे) तक मानी गई है। |
| तांत्रिक साधना — तंत्र शास्त्र में मध्यरात्रि को विशेष शक्ति काल माना जाता है। काली, भैरव, छिन्नमस्ता आदि तांत्रिक देवताओं की साधना इसी समय की जाती है। परंतु यह केवल दीक्षित साधकों के लिए है, सामान्य गृहस्थों के लिए नहीं। | — |
| ब्रह्म मुहूर्त (रात्रि 3:30-4:30 बजे के आसपास) — यह सर्वश्रेष्ठ पूजा समय है और रात्रि के अंतिम प्रहर में आता है। इसे रात्रि पूजा नहीं बल्कि प्रातःकालीन पूजा माना जाता है। | — |