शंकराचार्य (विवेकचूड़ामणि): ब्रह्म = परम सत्य, जगत = मिथ्या (न सत् न असत् — अनिर्वचनीय), जीव = ब्रह्म ही। 'मिथ्या' ≠ झूठा। रस्सी-साँप/स्वप्न उदाहरण। व्यावहारिक सत्ता (जगत सत्य) vs पारमार्थिक सत्ता (केवल ब्रह्म)।
स्रोत प्रश्न: 'जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' — का अर्थ क्या? →