संकीर्तन: सामूहिक, सस्वर गायन, संगीत, बहिर्मुखी, भक्ति प्रसार। जप: व्यक्तिगत, मौन/उपांशु, माला, अंतर्मुखी, मंत्र सिद्धि। चैतन्य: संकीर्तन श्रेष्ठ। योग: जप श्रेष्ठ। दोनों सत्य — मार्ग भिन्न, लक्ष्य एक।
- 1सामूहिक — भक्तों का समूह मिलकर।
- 2सस्वर गायन — भजन, कीर्तन, संगीत सहित। ढोलक, मृदंग, झांझ।
- 3उच्च स्वर में — 'हरे कृष्ण', 'राम राम' गाते हुए।
- 4चैतन्य महाप्रभु: 'कीर्तनीयः सदा हरिः' — कलियुग में कीर्तन सर्वश्रेष्ठ।
- 5उद्देश्य: भक्ति प्रसार, वातावरण शुद्धि, सामूहिक ऊर्जा।
- 6व्यक्तिगत या सामूहिक (बारी-बारी)।
- 7मौन/धीमे स्वर — माला से जप, उपांशु या मानसिक।
- 8एकाग्रता प्रधान — अंतर्मुखी साधना।
- 9उद्देश्य: मंत्र सिद्धि, आंतरिक शक्ति, ध्यान गहनता।
- 10संकीर्तन = बहिर्मुखी (बाहर), भक्ति प्रधान, आनंदमय।
- 11जप = अंतर्मुखी (भीतर), साधना प्रधान, शांतिमय।
- 12दोनों = नाम शक्ति, दोनों = भगवद्कृपा।