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बरगद के पेड़ की पूजा वट सावित्री व्रत में कैसे करें

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वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) या ज्येष्ठ पूर्णिमा (महाराष्ट्र/दक्षिण) को मनाया जाता है। स्नान-श्रृंगार के बाद बरगद की जड़ में जल, रोली, अक्षत, पुष्प चढ़ाएँ। कच्चा सूत 7 बार तने पर लपेटते हुए 7 परिक्रमा करें। सावित्री-सत्यवान कथा सुनें। वट में त्रिदेवों का वास — स्कन्द/भविष्योत्तर पुराण।

  1. 1स्कन्द पुराण और भविष्योत्तर पुराण: ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा (महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत में प्रचलित)।
  2. 2निर्णयामृत: ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा में प्रचलित)।
  3. 3प्रातःकाल स्नान करके सोलह श्रृंगार करें।
  4. 4लाल या पीला वस्त्र पहनें।
  5. 5पूजा सामग्री: जल, रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, लाल-पीले फूल, धूप, दीपक, मिठाई, फल, कच्चा सूत (सफ़ेद धागा), बाँस का पंखा, पान-सुपारी, सिंदूर।
  6. 6वट वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  7. 7सबसे पहले गणेश पूजन, फिर माता गौरी पूजन करें।
  8. 8वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें।
  9. 9रोली, अक्षत, हल्दी, कुमकुम, पुष्प चढ़ाएँ।
  10. 10धूप-दीप जलाएँ।
  11. 11नैवेद्य (मिठाई, फल) अर्पित करें।
  12. 12कच्चा सूत (रक्षा सूत्र) लेकर बरगद के तने के चारों ओर 7 बार लपेटें, साथ में 7 परिक्रमा करें।
  13. 13कुछ परम्पराओं में 11 परिक्रमा का भी विधान है।
  14. 14सूत लपेटना अटूट दाम्पत्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक है।
  15. 15वट सावित्री व्रत कथा (सावित्री-सत्यवान की कथा) का पाठ या श्रवण करें।
  16. 16निर्जला या फलाहार व्रत रखें।
  17. 17अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें।
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