दान से पापों का नाश कैसे होता है?
की चेकलिस्ट
गीता (17.20-22): सात्विक दान (निःस्वार्थ, पात्र को) = श्रेष्ठ, पापनाशक। अन्नदान सबसे बड़ा ('अन्नदानं परं दानम्')। दान से लोभ त्याग + पुण्य संचय + कर्म शुद्धि। दान = प्रायश्चित, पाप की छूट नहीं।
- 1सात्विक दान (17.20) — बिना प्रतिफल की इच्छा, उचित समय, पात्र व्यक्ति को — श्रेष्ठ, पापनाशक।
- 2राजसिक दान (17.21) — प्रत्युपकार या फल की इच्छा से — मध्यम, सीमित फल।
- 3तामसिक दान (17.22) — अपमानपूर्वक, अपात्र को — निकृष्ट, फल नहीं।
- 4त्याग भाव — दान में लोभ का त्याग होता है — लोभ पाप का मूल कारण है।
- 5पुण्य संचय — दान से पुण्य बढ़ता है जो पूर्व पापों को निष्प्रभावी करता है।
- 6कर्म शुद्धि — निःस्वार्थ दान = निष्काम कर्म = कर्म बंधन से मुक्ति।
सम्पूर्ण उत्तर
विस्तृत प्रश्न पृष्ठ देखें
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
श्रेणी
धर्म मार्गदर्शन
इस श्रेणी के अन्य प्रश्नोत्तर।