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देवी की पूजा करते समय किस भाव से बैठना चाहिए?

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भाव: शरणागति (बालक-माता), श्रद्धा-विश्वास, कृतज्ञता, निष्काम, एकाग्रता, विनम्रता, प्रेम। शारीरिक: सुखासन/पद्मासन, रीढ़ सीधी, नमस्कार/ध्यान मुद्रा। सार: विधि की कमी भक्ति पूरी करे, भक्ति की कमी विधि नहीं भर सके।

  1. 1शरणागति भाव: 'माता! मैं आपकी शरण में हूं।' बालक जैसे माता की गोद में निश्चिंत रहता है — वैसा ही भाव।
  2. 2श्रद्धा और विश्वास: 'देवी सर्वत्र विराजमान हैं, मेरी प्रार्थना अवश्य सुनेंगी।' संदेह रहित।
  3. 3कृतज्ञता: 'जो कुछ मिला है, वह सब माता की कृपा है।' धन्यवाद भाव।
  4. 4निष्काम भाव: पूजा केवल भक्ति और प्रेम से — बदले की अपेक्षा न्यूनतम। गीता: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'
  5. 5एकाग्रता: मन को पूजा में स्थिर रखें। विचार भटकें तो मंत्र जप पर ध्यान लौटाएं।
  6. 6विनम्रता: अहंकार रहित। 'मैं अल्पज्ञ हूं, देवी सर्वज्ञ हैं।'
  7. 7प्रेम भाव: जैसे पुत्री/पुत्र माता को प्रेम करता है — वैसा निश्छल प्रेम।
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देवी साधना

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