विस्तृत उत्तर
देवी पूजा में बाह्य विधि से अधिक आंतरिक भाव महत्वपूर्ण है:
पूजा में उत्तम भाव
- 1शरणागति भाव: 'माता! मैं आपकी शरण में हूं।' बालक जैसे माता की गोद में निश्चिंत रहता है — वैसा ही भाव।
- 1श्रद्धा और विश्वास: 'देवी सर्वत्र विराजमान हैं, मेरी प्रार्थना अवश्य सुनेंगी।' संदेह रहित।
- 1कृतज्ञता: 'जो कुछ मिला है, वह सब माता की कृपा है।' धन्यवाद भाव।
- 1निष्काम भाव: पूजा केवल भक्ति और प्रेम से — बदले की अपेक्षा न्यूनतम। गीता: 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'
- 1एकाग्रता: मन को पूजा में स्थिर रखें। विचार भटकें तो मंत्र जप पर ध्यान लौटाएं।
- 1विनम्रता: अहंकार रहित। 'मैं अल्पज्ञ हूं, देवी सर्वज्ञ हैं।'
- 1प्रेम भाव: जैसे पुत्री/पुत्र माता को प्रेम करता है — वैसा निश्छल प्रेम।
शारीरिक स्थिति
- ▸सुखासन, पद्मासन या वज्रासन में बैठें।
- ▸रीढ़ सीधी, कंधे शिथिल।
- ▸आंखें अर्ध-निमीलित (आधी खुली) या बंद।
- ▸हाथ जोड़कर (नमस्कार मुद्रा) या गोद में (ध्यान मुद्रा)।
सबसे महत्वपूर्ण: भक्ति भाव — शास्त्रों का सार यही है कि विधि की कमी भक्ति पूर्ण कर देती है, परंतु भक्ति की कमी विधि पूर्ण नहीं कर सकती।





