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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता 2.47) — कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यही कर्म योग का सार है। सर्वाधिक प्रसिद्ध, उद्धृत और प्रासंगिक श्लोक। अन्य प्रमुख: 4.7 (अवतार), 18.66 (शरणागति)।
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