गीता (2/17-25) के अनुसार आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और अविनाशी है। शस्त्र इसे काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती। यह देह बदलती है, आत्मा नहीं। यह परमात्मा का सनातन अंश है (15/7)।
- 1जो इस सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। इसे कोई नष्ट नहीं कर सकता।
- 2आत्मा न कभी जन्मती है, न मरती है, न पैदा होती है, न नष्ट होती है। यह प्राचीन, शाश्वत और नित्य है।
- 3इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती।
- 4जैसे पुराने वस्त्र छोड़कर नए धारण किए जाते हैं, वैसे आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया लेती है।
- 5इस जीव-लोक में जीव मेरा ही सनातन अंश है।