गीता में कर्म का सिद्धांत क्या है?
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गीता का कर्म-सिद्धांत (2/47) कहता है — कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। निष्काम कर्म, ईश्वर-अर्पण भाव और स्वधर्म-पालन — ये गीता के कर्मयोग के तीन स्तंभ हैं।
- 1कर्म करना तुम्हारा अधिकार है, फल की इच्छा मत करो। न फल के लिए कर्म करो, न कर्म से विरत हो जाओ।
- 2कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म में लगाते हैं।
- 3अच्छी तरह पालन किए गए पर-धर्म से अपना दोषपूर्ण धर्म भी श्रेष्ठ है।
- 4'मैं कर्ता हूँ' — यह भाव त्यागकर ईश्वर को निमित्त मानकर कर्म करने वाला मुक्त हो जाता है।
- 5सात्विक कर्म — बिना फल की इच्छा, राग-द्वेष के बिना
- 6राजसिक कर्म — अहंकार और फल की इच्छा से
- 7तामसिक कर्म — परिणाम की चिंता किए बिना मोहवश
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