जीवनमुक्त और विदेहमुक्त में क्या अंतर है
की चेकलिस्ट
जीवनमुक्त = जीवित रहते हुए ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त, शरीर में रहकर भी आसक्तिरहित (जैसे जनक)। विदेहमुक्त = शरीर छूटने पर ब्रह्म में विलय, पुनर्जन्म नहीं। जीवनमुक्त → मृत्यु पर → विदेहमुक्त। यह मुख्यतः अद्वैत वेदांत का सिद्धांत है।
- 1परिभाषा — जीवित रहते हुए ही मोक्ष प्राप्त कर लेना। शरीर में रहते हुए भी ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त हो जाना।
- 2स्थिति — शरीर विद्यमान है, प्रारब्ध कर्म भोगे जा रहे हैं, परंतु व्यक्ति को पूर्ण आत्म-ज्ञान हो चुका है। वह जानता है कि 'मैं शरीर नहीं, ब्रह्म हूं।'
- 3उदाहरण — जनक राजा, शुकदेव, याज्ञवल्क्य, रमण महर्षि
- 4लक्षण:
- 5उपमा — जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही जीवनमुक्त के कर्म नए बंधन नहीं बनाते।
- 6परिभाषा — शरीर छूटने (मृत्यु) के बाद मोक्ष। प्रारब्ध कर्म पूर्ण होने पर शरीर गिरता है और आत्मा ब्रह्म में विलीन होती है — पुनर्जन्म नहीं।
- 7स्थिति — जीवनमुक्त व्यक्ति जब शरीर त्यागता है, तब विदेहमुक्त होता है।
- 8अंतिम स्थिति — यह मोक्ष की पूर्णता है। कोई शरीर, कोई संसार, कोई बंधन शेष नहीं।
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