विस्तृत उत्तर
अद्वैत वेदांत परंपरा में मुक्ति दो प्रकार की मानी गई है — जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति। विद्यारण्य स्वामी ने 'जीवनमुक्तिविवेक' में इसका विस्तृत वर्णन किया है।
जीवनमुक्त (Living Liberation)
- 1परिभाषा — जीवित रहते हुए ही मोक्ष प्राप्त कर लेना। शरीर में रहते हुए भी ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त हो जाना।
- 2स्थिति — शरीर विद्यमान है, प्रारब्ध कर्म भोगे जा रहे हैं, परंतु व्यक्ति को पूर्ण आत्म-ज्ञान हो चुका है। वह जानता है कि 'मैं शरीर नहीं, ब्रह्म हूं।'
- 3उदाहरण — जनक राजा, शुकदेव, याज्ञवल्क्य, रमण महर्षि
- 4लक्षण:
- ▸सुख-दुख में समभाव
- ▸अहंकार का अभाव
- ▸संसार में रहकर भी आसक्तिरहित
- ▸गीता 2.54-72 (स्थितप्रज्ञ के लक्षण) — जीवनमुक्त का वर्णन
- 1उपमा — जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता, वैसे ही जीवनमुक्त के कर्म नए बंधन नहीं बनाते।
विदेहमुक्त (Liberation after Death)
- 1परिभाषा — शरीर छूटने (मृत्यु) के बाद मोक्ष। प्रारब्ध कर्म पूर्ण होने पर शरीर गिरता है और आत्मा ब्रह्म में विलीन होती है — पुनर्जन्म नहीं।
- 2स्थिति — जीवनमुक्त व्यक्ति जब शरीर त्यागता है, तब विदेहमुक्त होता है।
- 3अंतिम स्थिति — यह मोक्ष की पूर्णता है। कोई शरीर, कोई संसार, कोई बंधन शेष नहीं।
मुख्य अंतर
| विषय | जीवनमुक्त | विदेहमुक्त |
|---|---|---|
| शरीर | विद्यमान | शरीर नहीं |
| प्रारब्ध | भोग रहे | समाप्त |
| ज्ञान | पूर्ण | पूर्ण |
| संसार | रहते हुए मुक्त | संसार से परे |
| कर्म | प्रारब्ध शेष | कोई कर्म नहीं |
ध्यान दें: जीवनमुक्ति मुख्यतः अद्वैत वेदांत का सिद्धांत है। विशिष्टाद्वैत और द्वैत में मोक्ष मृत्यु के बाद ही (विदेहमुक्ति) माना जाता है।





