भागवत (1.2.21): प्रसन्न मन और भक्तियोग से ही भगवद्-अनुभव। उपाय: 'भगवान उपस्थित हैं' का भाव, मानसी पूजा, श्वास-नाम संयोग। अष्टसात्विक भाव (रोमांच, अश्रु आदि) भक्ति के स्वतः प्रकट होने वाले चिन्ह हैं। अनुभव खोजने से नहीं — निष्काम भक्ति से आता है।
- 1प्रसन्न मन और भक्तियोग से ही भगवान के तत्व का विज्ञान (प्रत्यक्ष अनुभव) होता है। अशांत मन में भगवान का अनुभव नहीं होता।
- 2स्थूल अनुभव: मंदिर में प्रवेश करते ही मन का हल्का होना, शांति का अनुभव
- 3सूक्ष्म अनुभव: पूजा के दौरान आँखों में अश्रु, शरीर में रोमांच, हृदय में अकारण आनंद
- 4दिव्य अनुभव: कीर्तन-ध्यान में विचार-शून्यता, 'केवल प्रकाश' या 'केवल आनंद' की अनुभूति
- 5भगवान का अनुभव खोजने से नहीं मिलता — निष्काम, शुद्ध, निरंतर भक्ति के परिपाक से स्वतः आता है।