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मंत्र जप में ऋष्यादि न्यास का क्या अर्थ है?

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'ऋषि-छन्द-देवता न्यास बिना जप = तुच्छ फल।' 7 अंग: ऋषि (शिर), छन्द (मुख), देवता (हृदय), बीज (गुह्य), शक्ति (चरण), कीलक (नाभि), विनियोग (अंजलि)। उदाहरण: नवार्ण — ब्रह्मविष्णुरुद्र ऋषि, गायत्री छन्द, महाकाली-लक्ष्मी-सरस्वती देवता। नाम जप/चालीसा में अनिवार्य नहीं।

  1. 1ऋषि (शिर पर न्यास): मंत्र के द्रष्टा ऋषि — जिन्होंने मंत्र साक्षात्कार किया। ऋषि से तादात्म्य स्थापित।
  2. 2छन्द (मुख पर): मंत्र का काव्य छन्द (गायत्री, अनुष्टुप आदि) — ध्वनि संरचना।
  3. 3देवता (हृदय पर): मंत्र के अधिष्ठाता देवता — जिनकी शक्ति मंत्र में विद्यमान।
  4. 4बीज (गुह्य/नाभि पर): मंत्र का बीजाक्षर — मूल शक्ति।
  5. 5शक्ति (चरणों पर): मंत्र की शक्ति — क्रियात्मक ऊर्जा।
  6. 6कीलक (नाभि पर): मंत्र का कीलक — जो मंत्र को बांधे/खोले।
  7. 7विनियोग (अंजलि, हृदय): मंत्र जप का उद्देश्य/प्रयोजन।
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