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मूर्ति पूजा वेदों में है या बाद में शुरू हुई?

की चेकलिस्ट

वेदों में मूर्ति पूजा का विस्तृत विधान नहीं — वैदिक पूजा यज्ञ-प्रधान थी। मूर्ति पूजा आगम शास्त्रों और पुराण काल में विकसित हुई। यह वेद-विरुद्ध नहीं, बल्कि वैदिक ज्ञान का लोक-अनुकूलन है। इस पर सम्प्रदायों में मत भिन्नता है।

  1. 1वेदों (विशेषतः ऋग्वेद) में मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष और विस्तृत विधान नहीं मिलता। वेदों में प्रमुख पूजा विधि यज्ञ (हवन) है — अग्नि के माध्यम से देवताओं को आहुति।
  2. 2वैदिक काल की पूजा मुख्यतः यज्ञ, मंत्र जप, स्तोत्र पाठ पर आधारित थी।
  3. 3हालाँकि ऋग्वेद में कुछ सूक्तों में देवताओं के भौतिक स्वरूप का वर्णन है (इंद्र का वज्र, विष्णु के पद आदि) जो मूर्ति निर्माण की प्रेरणा हो सकते हैं।
  4. 4उत्तर वैदिक काल/गृहसूत्र काल में मूर्ति पूजा के संकेत मिलने लगते हैं।
  5. 5आगम शास्त्र (शैव आगम, वैष्णव पंचरात्र, शाक्त तंत्र) — मूर्ति पूजा, मंदिर निर्माण और प्रतिमा विज्ञान का विस्तृत विधान।
  6. 6शिल्पशास्त्र (मयमतम्, मानसार, विश्वकर्मा प्रकाश) — मूर्ति निर्माण की विस्तृत तकनीक।
  7. 7पुराण काल — मूर्ति पूजा पूर्णतः प्रचलित और स्थापित।
  8. 8मूर्ति पूजा वेदों के विरुद्ध नहीं है — यह वैदिक ज्ञान का विस्तार और लोक-अनुकूलन है।
  9. 9वेदों में ईश्वर सर्वव्यापक और निराकार है — मूर्ति पूजा उसी निराकार ईश्वर तक पहुँचने का साकार मार्ग है।
  10. 10समय के साथ भक्ति आंदोलन ने मूर्ति पूजा को और व्यापक बनाया।
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