'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) = बृहदारण्यक उपनिषद (2.3.6)। ब्रह्म को जानने की निषेध विधि — जो कुछ भी सीमित/नाशवान/दृश्य है, वह ब्रह्म नहीं। सब नकार दो, जो शेष बचे वही ब्रह्म। शंकराचार्य: यह शून्य नहीं, अतिरेक है।
- 1अब ब्रह्म का निर्देश — 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं)।
- 2ब्रह्म यह शरीर नहीं — नेति
- 3ब्रह्म यह मन नहीं — नेति
- 4ब्रह्म यह बुद्धि नहीं — नेति
- 5ब्रह्म छोटा नहीं, बड़ा नहीं, प्रकाश नहीं, अंधकार नहीं...
- 6जो कुछ भी सीमित, नाशवान, दृश्य है — वह ब्रह्म नहीं।
- 7जब सब कुछ नकार दिया जाता है, जो शेष बचता है — वही ब्रह्म है।
- 8जैसे कोई पूछे 'आकाश किस रंग का है?' — हर रंग कहने पर 'नहीं' कहना पड़ेगा, क्योंकि आकाश किसी एक रंग में सीमित नहीं — वह सबसे परे है।