प्रेत योनि = शरीर छूटा पर अगली गति नहीं मिली। कारण: अंत्येष्टि न होना, अतृप्त इच्छाएं, अकाल मृत्यु, आत्महत्या, अत्यधिक पाप। मुक्ति: विधिवत अंत्येष्टि, गया पिंडदान, गरुड़ पुराण पाठ, नारायण बलि। मूल कारण — आसक्ति (गीता 2.62-63)।
1परिभाषा — 'प्रेत' = प्र (विशेष) + इत (गया हुआ) — अर्थात जो शरीर से तो निकल गया परंतु अगली गति प्राप्त नहीं कर पाया।
2सूक्ष्म शरीर — प्रेत के पास स्थूल शरीर नहीं होता। वह सूक्ष्म शरीर (वायव्य/आतिवाहिक शरीर) में रहता है — भूख, प्यास, इच्छा है परंतु उन्हें पूर्ण करने का शरीर नहीं।
3अत्यंत कष्टदायक — गरुड़ पुराण में प्रेत योनि को अत्यंत दुःखदायक बताया गया है — न सुख, न शांति, न गति।
4अंत्येष्टि संस्कार न होना — दाह संस्कार, पिंडदान, तर्पण न होने पर आत्मा प्रेत बनी रहती है। इसीलिए अंत्येष्टि संस्कार अत्यंत आवश्यक है।
5अतृप्त इच्छाएं — मृत्यु के समय अत्यंत प्रबल इच्छा/आसक्ति (धन, संपत्ति, परिवार, शरीर) शेष रहना।
6अकाल मृत्यु — दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, या समय से पहले मृत्यु — आयु शेष रहने पर प्रेत योनि मानी जाती है।