विस्तृत उत्तर
प्रेत योनि एक ऐसी अवस्था है जिसमें मृत आत्मा को न तो नया शरीर मिलता है, न स्वर्ग/नरक, न मोक्ष — वह एक सूक्ष्म अवस्था में अटकी रहती है।
प्रेत योनि क्या है
- 1परिभाषा — 'प्रेत' = प्र (विशेष) + इत (गया हुआ) — अर्थात जो शरीर से तो निकल गया परंतु अगली गति प्राप्त नहीं कर पाया।
- 1सूक्ष्म शरीर — प्रेत के पास स्थूल शरीर नहीं होता। वह सूक्ष्म शरीर (वायव्य/आतिवाहिक शरीर) में रहता है — भूख, प्यास, इच्छा है परंतु उन्हें पूर्ण करने का शरीर नहीं।
- 1अत्यंत कष्टदायक — गरुड़ पुराण में प्रेत योनि को अत्यंत दुःखदायक बताया गया है — न सुख, न शांति, न गति।
प्रेत कैसे बनता है — प्रमुख कारण
- 1अंत्येष्टि संस्कार न होना — दाह संस्कार, पिंडदान, तर्पण न होने पर आत्मा प्रेत बनी रहती है। इसीलिए अंत्येष्टि संस्कार अत्यंत आवश्यक है।
- 1अतृप्त इच्छाएं — मृत्यु के समय अत्यंत प्रबल इच्छा/आसक्ति (धन, संपत्ति, परिवार, शरीर) शेष रहना।
- 1अकाल मृत्यु — दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, या समय से पहले मृत्यु — आयु शेष रहने पर प्रेत योनि मानी जाती है।
- 1अत्यंत पाप — अधर्मी, क्रूर और महापापी व्यक्ति।
- 1आत्महत्या — गरुड़ पुराण में आत्महत्या करने वाले को प्रेत योनि प्राप्त होती है — ऐसा वर्णन है। (यह पौराणिक मान्यता है।)
- 1परिवार का शोक — अत्यधिक शोक और विलाप भी आत्मा को बांधता है — ऐसी मान्यता है।
प्रेत योनि से मुक्ति के उपाय
- 1विधिवत अंत्येष्टि — दाह संस्कार और 13 दिन के संस्कार पूर्ण करें।
- 2पिंडदान — विशेषकर गया श्राद्ध। गया (बिहार) में पिंडदान प्रेतमुक्ति के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
- 3गरुड़ पुराण पाठ — मृत्यु के 13 दिनों में गरुड़ पुराण का पाठ/श्रवण।
- 4नारायण बलि — विशेष पूजा अनुष्ठान।
- 5वार्षिक श्राद्ध — नियमित पितृ तर्पण।
- 6गोदान — गाय का दान वैतरणी पार कराने हेतु।
दार्शनिक दृष्टिकोण
प्रेत योनि का वर्णन अतृप्ति और आसक्ति के खतरों की चेतावनी है। गीता 2.62-63 में कहा गया है — आसक्ति → काम → क्रोध → बुद्धिनाश। आसक्ति मृत्यु के बाद भी बांधती है — यही प्रेत योनि का मूल कारण है।





