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आत्मा और मोक्ष📜 गरुड़ पुराण — प्रेतकल्प, भागवत पुराण, अथर्ववेद3 मिनट पठन

प्रेत योनि क्या है और कोई प्रेत कैसे बनता है

संक्षिप्त उत्तर

प्रेत योनि = शरीर छूटा पर अगली गति नहीं मिली। कारण: अंत्येष्टि न होना, अतृप्त इच्छाएं, अकाल मृत्यु, आत्महत्या, अत्यधिक पाप। मुक्ति: विधिवत अंत्येष्टि, गया पिंडदान, गरुड़ पुराण पाठ, नारायण बलि। मूल कारण — आसक्ति (गीता 2.62-63)।

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विस्तृत उत्तर

प्रेत योनि एक ऐसी अवस्था है जिसमें मृत आत्मा को न तो नया शरीर मिलता है, न स्वर्ग/नरक, न मोक्ष — वह एक सूक्ष्म अवस्था में अटकी रहती है।

प्रेत योनि क्या है

  1. 1परिभाषा — 'प्रेत' = प्र (विशेष) + इत (गया हुआ) — अर्थात जो शरीर से तो निकल गया परंतु अगली गति प्राप्त नहीं कर पाया।
  1. 1सूक्ष्म शरीर — प्रेत के पास स्थूल शरीर नहीं होता। वह सूक्ष्म शरीर (वायव्य/आतिवाहिक शरीर) में रहता है — भूख, प्यास, इच्छा है परंतु उन्हें पूर्ण करने का शरीर नहीं।
  1. 1अत्यंत कष्टदायक — गरुड़ पुराण में प्रेत योनि को अत्यंत दुःखदायक बताया गया है — न सुख, न शांति, न गति।

प्रेत कैसे बनता है — प्रमुख कारण

  1. 1अंत्येष्टि संस्कार न होना — दाह संस्कार, पिंडदान, तर्पण न होने पर आत्मा प्रेत बनी रहती है। इसीलिए अंत्येष्टि संस्कार अत्यंत आवश्यक है।
  1. 1अतृप्त इच्छाएं — मृत्यु के समय अत्यंत प्रबल इच्छा/आसक्ति (धन, संपत्ति, परिवार, शरीर) शेष रहना।
  1. 1अकाल मृत्यु — दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, या समय से पहले मृत्यु — आयु शेष रहने पर प्रेत योनि मानी जाती है।
  1. 1अत्यंत पाप — अधर्मी, क्रूर और महापापी व्यक्ति।
  1. 1आत्महत्या — गरुड़ पुराण में आत्महत्या करने वाले को प्रेत योनि प्राप्त होती है — ऐसा वर्णन है। (यह पौराणिक मान्यता है।)
  1. 1परिवार का शोक — अत्यधिक शोक और विलाप भी आत्मा को बांधता है — ऐसी मान्यता है।

प्रेत योनि से मुक्ति के उपाय

  1. 1विधिवत अंत्येष्टि — दाह संस्कार और 13 दिन के संस्कार पूर्ण करें।
  2. 2पिंडदान — विशेषकर गया श्राद्ध। गया (बिहार) में पिंडदान प्रेतमुक्ति के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है।
  3. 3गरुड़ पुराण पाठ — मृत्यु के 13 दिनों में गरुड़ पुराण का पाठ/श्रवण।
  4. 4नारायण बलि — विशेष पूजा अनुष्ठान।
  5. 5वार्षिक श्राद्ध — नियमित पितृ तर्पण।
  6. 6गोदान — गाय का दान वैतरणी पार कराने हेतु।

दार्शनिक दृष्टिकोण

प्रेत योनि का वर्णन अतृप्ति और आसक्ति के खतरों की चेतावनी है। गीता 2.62-63 में कहा गया है — आसक्ति → काम → क्रोध → बुद्धिनाश। आसक्ति मृत्यु के बाद भी बांधती है — यही प्रेत योनि का मूल कारण है।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण — प्रेतकल्प, भागवत पुराण, अथर्ववेद
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