सहस्रचंडी = 100 ब्राह्मणों द्वारा सप्तशती के 1,000 पाठ + दशांश हवन। 9-11 दिन। उद्देश्य: राष्ट्र संकट, महामारी, महाभय निवारण। कहाँ: शक्तिपीठ (विन्ध्यवासिनी, कामाख्या), तीर्थ (काशी, प्रयाग, हरिद्वार)। सामूहिक/संस्थागत अनुष्ठान — 100 पण्डित आवश्यक। इससे बड़ा: लक्षचंडी (1,00,000 पाठ)।
- 1100 ब्राह्मणों द्वारा दुर्गा सप्तशती के 1,000 पाठ।
- 2प्रत्येक पाठ संपुटित (नवार्ण मंत्र 100-100 बार आदि-अन्त में)।
- 3पाठ पूर्ण होने पर दशांश हवन।
- 4अवधि: सामान्यतः 9-11 दिन (100 पण्डित × प्रतिदिन ~1 पाठ = 10 दिन + हवन)।
- 5राज्यनाश/राष्ट्र संकट
- 6महाउत्पात/प्राकृतिक आपदा
- 7महामारी
- 8शत्रुभय
- 9महारोग
- 10सामूहिक कल्याण
- 11शक्तिपीठ या देवी मन्दिरों में — विन्ध्यवासिनी, वैष्णो देवी, कामाख्या, कालीघाट।
- 12प्रसिद्ध तीर्थस्थल — प्रयागराज, काशी, हरिद्वार, उज्जैन।
- 13त्र्यम्बकेश्वर, नासिक में भी यह अनुष्ठान होता है।
- 14बड़े मठ और आश्रम (शंकराचार्य मठ, रामकृष्ण मिशन आदि) में भी कभी-कभी आयोजित।
- 15100 विद्वान ब्राह्मणों की आवश्यकता — अतः यह व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक/संस्थागत अनुष्ठान है।
- 16अत्यधिक खर्चीला और जटिल।
- 17विश्वसनीय धार्मिक संस्था या मन्दिर ट्रस्ट के माध्यम से करवाएँ।